प्राचीन भारतीय साहित्य और इतिहास Ancient Indian Literature and History

प्राचीन भारतीय साहित्य और इतिहास

संहिता के बाद ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों का स्थान है। इनसे हमें उत्तर वैदिक काल के समाज और संस्कृति के बारे में जानकारी मिलती है।

वेद और ब्राह्मण ग्रंथ

ब्राह्मण ग्रंथ वैदिक संहिताओं की व्याख्या करने के लिए गद्य में लिखे गए हैं। प्रत्येक संहिता के लिए अलग-अलग ब्राह्मण ग्रंथ हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • ऋग्वेद: ऐतरेय और कौषीतकी ब्राह्मण
  • यजुर्वेद: तैत्तिरीय और शतपथ ब्राह्मण
  • सामवेद: पंचविश ब्राह्मण
  • अथर्ववेद: गोपथ ब्राह्मण

इन ब्राह्मण ग्रंथों से परीक्षित के बाद और बिम्बसार के पूर्व की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है। ऐतरेय ब्राह्मण में राज्याभिषेक के नियम और कुछ प्राचीन राजाओं के नाम दिए गए हैं। शतपथ ब्राह्मण में गंधार, शल्य, कैकय, कुरु, पंचाल, कोसल, विदेह आदि राजाओं का उल्लेख मिलता है। वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का विशेष स्थान है।

आरण्यक और उपनिषद

आरण्यक ग्रंथ यज्ञ से जुड़े कर्मकाण्डों की दार्शनिक और प्रतीकात्मक व्याख्या करते हैं। उपनिषदों की संख्या 108 है, जिनमें से 13 को मूलभूत उपनिषद माना जाता है। इन उपनिषदों में यज्ञ से जुड़े दार्शनिक विचार, शरीर, ब्रह्माण्ड, आत्मा और ब्रह्म की व्याख्या की गई है।

स्त्रियों की स्थिति

मैत्रेयनी संहिता में स्त्री की स्थिति को बहुत ही गिरा हुआ बताया गया है, जहाँ उसे जुआ और शराब की तरह पुरुष का तीसरा मुख्य दोष माना गया है। वहीं शतपथ ब्राह्मण में स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है।

आश्रम व्यवस्था और स्मृतिग्रंथ

जाबालोपनिषद में चारों आश्रमों का उल्लेख मिलता है। स्मृतिग्रंथों में सबसे प्राचीन और प्रामाणिक मनुस्मृति मानी जाती है, जो शुंग काल का मानक ग्रंथ है। नारद स्मृति गुप्त युग के विषय में जानकारी प्रदान करती है।

वैदिक साहित्य को संरक्षित और संहिताबद्ध रखने के लिए सूत्र साहित्य का निर्माण किया गया है। श्रीत, गृह और धर्मसूत्रों के अध्ययन से हमें यज्ञ विधि-विधानों, कर्मकाण्डों, राजनीति, विधि और सामाजिक व्यवहार के महत्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी मिलती है।

प्रमुख सूत्रकारों में गौतम, बौद्धायन, आपस्तम्भ और वशिष्ठ के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनमें गौतम धर्मसूत्र सबसे प्राचीन माना जाता है।

पुराण

भारतीय ऐतिहासिक कथाओं का सबसे अच्छा क्रमबद्ध विवरण पुराणों में मिलता है। विष्णु पुराण में मौर्य वंश का, मत्स्य पुराण में आन्ध्र सातवाहन का, और वायु पुराण में गुप्त वंश का उल्लेख है। इन पुराणों के रचयिता लोमहर्ष और उनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं। पुराणों की संख्या 18 है, जिनमें से पांच- मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्रह्म और भागवत पुराण में ही राजाओं की वंशावली पायी जाती है।

ध्यान देने योग्य बात है कि मत्स्य पुराण सबसे प्राचीन और प्रामाणिक माना जाता है। अधिकतर पुराण सरल संस्कृत श्लोकों में लिखे गए हैं। स्त्रियाँ और शूद्र, जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी, वे भी पुराण सुन सकते थे। पुराणों का पाठ पुजारी मंदिरों में किया करते थे।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अग्निपुराण का काफी महत्व है। इसमें राजतंत्र के साथ-साथ कृषि संबंधी विवरण भी दिया गया है।

बौद्ध, जैन एवं अन्य साहित्य

जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्वजन्म की कहानियाँ वर्णित हैं। हीनयान बौद्ध साहित्य का प्रमुख ग्रंथ ‘कथावस्तु’ है, जिसमें महात्मा बुद्ध का जीवनचरित अनेक कथाओं के साथ वर्णित है।

जैन साहित्य को आगम कहा जाता है। जैन धर्म का प्रारंभिक इतिहास ‘कल्पसूत्र’ से ज्ञात होता है। जैन ग्रंथ ‘भगवती सूत्र’ में महावीर के जीवन और उनके समकालीनों के साथ उनके संबंधों का विवरण मिलता है।

अर्थशास्त्र

‘अर्थशास्त्र’ के लेखक चाणक्य (कौटिल्य या विष्णुगुप्त) हैं। यह ग्रंथ 15 अधिकरणों और 180 प्रकरणों में विभाजित है। इससे मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी मिलती है। इसका अनुवाद शाम शास्त्री ने किया है।

संस्कृत साहित्य

संस्कृत साहित्य में ऐतिहासिक घटनाओं को क्रमबद्ध रूप में लिखने का सबसे पहला प्रयास कल्हण ने किया। उनकी पुस्तक ‘राजतरंगिणी’ (राजाओं की नदी) है। इस ग्रंथ में आठ सर्ग (अध्याय) हैं, जिन्हें तरंगों की संज्ञा दी गई है। इसमें प्रारंभ से लेकर 12वीं सदी तक के कश्मीर के शासकों का वर्णन है।

अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ

अरबों की सिंध विजय का विवरण ‘चचनामा’ (लेखक अली अहमद) में सुरक्षित है।

‘अष्टाध्यायी’ (संस्कृत भाषा के व्याकरण की पहली पुस्तक) के लेखक पाणिनि हैं। इससे मौर्य काल के पहले का इतिहास और मौर्य युग की राजनीतिक स्थिति की जानकारी मिलती है। नोट: अष्टाध्यायी में पहली बार ‘लिपि’ शब्द का प्रयोग हुआ है।

कात्यायन की ‘गार्गी-संहिता’ एक ज्योतिष ग्रंथ है, फिर भी इसमें भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है।

पतंजलि, जो पुष्यमित्र शुंग के पुरोहित थे, उनके ‘महाभाष्य’ से शुंगों के इतिहास का पता चलता है।

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