हिन्दी भाषा का विकास कैसे हुवा ?

हिन्दी भाषा का विकास कैसे हुवा

हिन्दी शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई ?

हिन्दी शब्द की उत्पत्ति भारत के उत्तर-पश्चिम में बहने वाली सिंधु नदी से संबंधित है। अधिकतर विदेशी यात्री और आक्रांता इसी सिंधु नदी के रास्ते भारत आए थे। उन्होंने जिस देश को देखा, वह ‘सिंधु’ का देश था। भारत के प्राचीन काल से ही ईरान (फारस) के साथ संबंध थे और ईरानी लोग ‘सिंधु’ को ‘हिन्दु’ कहते थे। पहलवी भाषा की प्रवृत्ति के अनुसार, ‘सिंधु’ में ‘स’ को ‘ह’ और ‘ध’ को ‘द’ में बदलकर ‘हिन्दु’ कहा गया। ‘हिन्दु’ से ‘हिन्द’ बना और फिर ‘हिन्द’ में फारसी भाषा का संबंध कारक प्रत्यय ‘ई’ जोड़ने से ‘हिन्दी’ बन गया। ‘हिन्दी’ का अर्थ है ‘हिन्द का’। इस प्रकार हिन्दी शब्द की उत्पत्ति हिन्द देश के निवासियों के अर्थ में हुई। आगे चलकर यह शब्द ‘हिन्द की भाषा’ के अर्थ में प्रयोग होने लगा।

उपर्युक्त बातों से तीन बातें स्पष्ट होती हैं:

  1. ‘हिन्दी’ शब्द का विकास कई चरणों में हुआ: सिंधु → हिन्दु → हिन्द + ई → हिन्दी।
  2. ‘हिन्दी’ शब्द मूलतः फारसी का है, न कि हिन्दी भाषा का। यह ऐसे है जैसे बच्चा हमारे घर में जन्मे और उसका नामकरण हमारा पड़ोसी करे।
  3. ‘हिन्दी’ शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं – ‘हिन्द देश के निवासी’ और ‘हिन्द की भाषा’।

1 . ‘हिन्दी’ शब्द का विकास कई चरणों में हुआ-सिंधु हिन्दु हिन्द ई हिन्दी।

2. ‘हिन्दी’ शब्द मूलतः फ़ारसी का है न कि हिन्दी भाषा का । यह ऐसे ही है जैसे बच्चा हमारे घर जनमे और उसका नामकरण हमारा पड़ोसी करे। हालांकि कुछ कट्टर हिन्दी-प्रेमी ‘हिन्दी’ शब्द की व्युत्पत्ति हिन्दी भाषा में ही दिखाने की कोशिश की है, जैसे- हिन (हनन करनेवाला)+दु (दुष्ट) = हिन्दु अर्थात् दुष्टों का हनन करनेवाला हिन्दु और उन लोगों की भाषा हिन्दी; हीन (हीनो) + दु (दलन) = हिन्दु अर्थात् हीनों का दलन करनेवाला हिन्दु और उनकी भाषा हिन्दी। चूँकि इन व्युत्पत्तियों में प्रमाण कम, अनुमान अधिक है इसलिए सामान्यतः इन्हें स्वीकारा नहीं जाता ।

3. ‘हिन्दी’ शब्द के दो अर्थ हैं- ‘हिन्द देश के निवासी'(यथा- ‘हिन्दी है हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा’ – इक़बाल) और ‘हिन्द की भाषा’। हाँ, यह बात अलग है कि अब यह शब्द इन दो आरंभिक अर्थों से अलग हो गया है। इस देश के निवासियों को अब कोई ‘हिन्दी’ नहीं कहता बल्कि भारतवासी, हिन्दुस्तानी आदि कहते हैं। दूसरे, इस देश की व्यापक भाषा के अर्थ में भी अब ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग नहीं होता क्योंकि भारत में अनेक भाषाएँ हैं जो सब हिन्दी नहीं कहलाती । बेशक ये सभी हिन्द की भाषाएं हैं लेकिन केवल हिन्दी नहीं हैं। उन्हें हम पंजाबी, बांग्ला, असमिया, उड़िया, मराठी आदि नामों से पुकारते हैं इसलिए हिन्द की इन सब भाषाओं के लिए ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता।

हिन्दी का विकास कैसे हुआ?

हिंदी का विकास तीन कालों में हुआ है – प्राचीन हिन्दी, मध्यकालीन हिन्दी और आधुनिक हिन्दी

1. प्राचीन हिन्दी

  • मध्यदेशीय भाषा की उत्तराधिकारिणी होने के कारण हिन्दी का स्थान आधुनिक भाषाओं में सर्वोपरि है।
  • प्राचीन हिन्दी से अभिप्राय है- अपभ्रंश-अवहट्ट के बाद की भाषा ।
  • हिन्दी का प्राचीन काल हिन्दी भाषा का शिशु-काल है। यह वह काल था जब अपभ्रंश-अवहट्ट का प्रभाव हिन्दी भाषा पर मौजूद था और हिन्दी की बोलियों के निश्चित व स्पष्ट स्वरूप विकसित नहीं हुए थे।

‘हिन्दी’ शब्द की उत्पत्ति भारत के उत्तर-पश्चिम में बहने वाली सिंधु नदी से संबंधित है। बहुत से विदेशी यात्री और आक्रांता उत्तर-पश्चिम के सिंहद्वार से ही भारत आए। उनके लिए यह ‘सिंधु’ का देश था। ईरान (फारस) के साथ भारत के बहुत पुराने संबंध थे और ईरानी ‘सिंधु’ को ‘हिन्दु’ कहते थे (सिंधु में ‘स’ का ‘ह’ और ‘ध’ का ‘द’ में परिवर्तन – पहलवी भाषा की ध्वनि परिवर्तन की प्रवृत्ति के अनुसार)। ‘हिन्दु’ से ‘हिन्द’ बना और फिर ‘हिन्द’ में फारसी भाषा का संबंध कारक प्रत्यय ‘ई’ जुड़ने से ‘हिन्दी’ बना। ‘हिन्दी’ का अर्थ है- ‘हिन्द का’। इस प्रकार ‘हिन्दी’ शब्द की उत्पत्ति हिन्द देश के निवासियों के अर्थ में हुई। बाद में यह शब्द ‘हिन्द की भाषा’ के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा।

‘हिन्दी’ शब्द की उत्पत्ति भारत के उत्तर-पश्चिम में बहने वाली सिंधु नदी से संबंधित है। बहुत से विदेशी यात्री और आक्रांता उत्तर-पश्चिम के सिंहद्वार से ही भारत आए। उनके लिए यह ‘सिंधु’ का देश था। ईरान (फारस) के साथ भारत के बहुत पुराने संबंध थे और ईरानी ‘सिंधु’ को ‘हिन्दु’ कहते थे (सिंधु में ‘स’ का ‘ह’ और ‘ध’ का ‘द’ में परिवर्तन – पहलवी भाषा की ध्वनि परिवर्तन की प्रवृत्ति के अनुसार)। ‘हिन्दु’ से ‘हिन्द’ बना और फिर ‘हिन्द’ में फारसी भाषा का संबंध कारक प्रत्यय ‘ई’ जुड़ने से ‘हिन्दी’ बना। ‘हिन्दी’ का अर्थ है- ‘हिन्द का’। इस प्रकार ‘हिन्दी’ शब्द की उत्पत्ति हिन्द देश के निवासियों के अर्थ में हुई। बाद में यह शब्द ‘हिन्द की भाषा’ के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा।

इससे तीन मुख्य बातें सामने आती हैं:

  1. ‘हिन्दी’ शब्द का विकास कई चरणों में हुआ: सिंधु → हिन्दु → हिन्द + ई → हिन्दी।
  2. ‘हिन्दी’ शब्द मूलतः फारसी का है, न कि हिन्दी भाषा का। यह ऐसे है जैसे बच्चा हमारे घर जन्मे और उसका नामकरण हमारा पड़ोसी करे। कुछ कट्टर हिन्दी-प्रेमी ‘हिन्दी’ शब्द की उत्पत्ति हिन्दी भाषा में ही दिखाने की कोशिश करते हैं, जैसे- हिन (हनन करने वाला) + दु (दुष्ट) = हिन्दु अर्थात दुष्टों का हनन करने वाला हिन्दु और उनकी भाषा हिन्दी; हीन (हीनों) + दु (दलन) = हिन्दु अर्थात हीनों का दलन करने वाला हिन्दु और उनकी भाषा हिन्दी। चूँकि इन व्युत्पत्तियों में प्रमाण कम और अनुमान अधिक हैं, इसलिए सामान्यतः इन्हें स्वीकार नहीं किया जाता।
  3. ‘हिन्दी’ शब्द के दो अर्थ हैं- ‘हिन्द देश के निवासी’ (जैसे- ‘हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां’) और ‘हिन्द की भाषा’। हाँ, यह बात सही है कि अब ‘हिन्दी’ शब्द इन दो आरंभिक अर्थों से अलग हो गया है। इस देश के निवासियों को अब कोई ‘हिन्दी’ नहीं कहता बल्कि भारतवासी या हिन्दुस्तानी कहते हैं। दूसरे, इस देश की प्रमुख भाषा के अर्थ में भी अब ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग नहीं होता क्योंकि भारत में अनेक भाषाएँ हैं जो सभी हिन्दी नहीं कहलातीं। बेशक ये सभी भाषाएँ हिन्द की हैं, लेकिन केवल हिन्दी नहीं हैं। इन्हें हम पंजाबी, बांग्ला, असमिया, उड़िया, मराठी आदि नामों से पुकारते हैं। इसलिए हिन्द की इन सभी भाषाओं के लिए ‘हिन्दी’ शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता।

प्रमुख रचनाकार: ‘हिन्दी’ शब्द किसी एक भाषा का नाम नहीं है, बल्कि यह एक भाषा-समूह का नाम है। इस समूह में आज के हिन्दी प्रदेश या क्षेत्र की 5 उपभाषाएँ और 17 बोलियाँ शामिल हैं। इन बोलियों में ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली को मध्यकाल में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ।

ब्रजभाषा: प्राचीन हिन्दी काल में ब्रजभाषा अपभ्रंश और अवहट्ट से ही जीवन-रस लेती रही। अपभ्रंश-अवहट्ट की रचनाओं में ब्रजभाषा के शुरुआती अंकुर देखे जा सकते हैं। ब्रजभाषा साहित्य का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ सुधीर अग्रवाल का ‘प्रद्युम्न चरित’ (1354 ई.) है।

अवधी: अवधी की पहली कृति मुल्ला दाउद की ‘चंदायन’ या ‘लोरकहा’ (1370 ई.) मानी जाती है। इसके बाद अवधी भाषा के साहित्य का विकास होता गया।

खड़ी बोली: प्राचीन हिन्दी काल में खड़ी बोली के साहित्य में इसके शुरुआती प्रयोगों से उसके आरंभिक रूप का पता चलता है। खड़ी बोली का आदिकालीन रूप सरहपा और अन्य सिद्धों, गोरखनाथ और अन्य नाथों, अमीर खुसरो जैसे सूफियों, जयदेव, नामदेव, और रामानंद जैसे संतों की रचनाओं में मिलता है। इन रचनाकारों की रचनाओं में अपभ्रंश-अवहट्ट से निकलती हुई खड़ी बोली स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

मध्यकालीन हिन्दी

मध्यकाल में हिन्दी भाषा का स्वरूप स्पष्ट हो गया और उसकी प्रमुख बोलियाँ विकसित हो गईं। इस काल में हिन्दी के तीन प्रमुख रूप सामने आए: ब्रजभाषा, अवधी और खड़ी बोली। इनमें ब्रजभाषा और अवधी का अत्यधिक साहित्यिक विकास हुआ और इन भाषाओं को कुछ देशी राज्यों का संरक्षण भी मिला। इसके अलावा, खड़ी बोली का भी साहित्य में प्रयोग होता रहा, विशेषकर 14वीं सदी में दक्षिण भारत में इसका अधिक प्रयोग हुआ। 18वीं सदी में खड़ी बोली को मुसलमान शासकों का संरक्षण मिला और इसके विकास को नई दिशा मिली।

प्रमुख रचनाकार

ब्रजभाषा

मध्यकाल में ब्रजभाषा ने मध्य देश की महान भाषा परंपरा को आगे बढ़ाया। यह उस समय की परिनिष्ठित और उच्च कोटि की साहित्यिक भाषा थी, जिसे खासतौर पर कृष्णभक्त कवियों ने गौरवान्वित किया। भक्ति काल में कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा का चरम विकास किया। इस समय के प्रमुख कवियों में सूरदास (‘सूर सागर’), नंद दास, श्री भट्ट, गदाधर भट्ट, हित हरिवंश, रसखान और मीराबाई शामिल हैं। इनमें सूरदास का स्थान सबसे प्रमुख है, जिन्हें ‘अष्टछाप का जहाज’ कहा जाता है।

रीतिकाल में ब्रजभाषा में लाक्षणिक और रीति-ग्रंथ लिखकर कई आचार्यों और कवियों ने इसे समृद्ध किया। प्रमुख रीतिबद्ध कवियों में केशवदास, चिंतामणि, मतिराम, सेनापति, देव, पद्माकर आदि, रीतिसिद्ध कवियों में बिहारी, रसनिधि आदि, और रीतिमुक्त कवियों में घनानंद, आलम, ठाकुर, बोधा, द्विजदेव आदि शामिल हैं।

अवधी

अवधी को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय सूफ़ी और प्रेममार्गी कवियों को जाता है। प्रमुख सूफ़ी कवियों में कुतुबन (‘मृगावती’), जायसी (‘पद्मावत’), मंझन (‘मधुमालती’), आलम (‘माधवानल कामकंदला’), उसमान (‘चित्रावली’), नूर मुहम्मद (‘इन्द्रावती’), कासिमशाह (‘हंस जवाहिर’), शेख निसार (‘यूसुफ जुलेखा’) और अलीशाह (‘प्रेम चिंगारी’) शामिल हैं। इनमें जायसी सबसे प्रमुख थे।

रामभक्त कवियों ने भी अवधी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की रचना बैसवारी अवधी में कर इस भाषा को उच्च साहित्यिक ऊँचाई पर पहुँचाया। अवधी के साहित्यिक उत्कर्ष का चरम जायसी और तुलसीदास में देखने को मिलता है।

खड़ी बोली

मध्यकाल में खड़ी बोली का मुख्य केंद्र उत्तर से बदलकर दक्कन में हो गया। इस प्रकार, खड़ी बोली के दो रूप हो गए – उत्तरी हिन्दी और दक्कनी हिन्दी। मध्यकाल में खड़ी बोली का प्रयोग संत कवियों जैसे कबीर, नानक, दादू, मलूकदास, और रज्जब ने किया। इसके अलावा, गंग की ‘चन्द छन्द वर्णन की महिमा’, रहीम के ‘मदनाष्टक’, आलम के ‘सुदामा चरित’, जटमल की ‘गोरा बादल की कथा’, और दक्कनी तथा उर्दू के कवियों जैसे वली, सौदा, इन्शा, और नज़ीर की रचनाओं में खड़ी बोली का प्रयोग देखने को मिलता है।

निष्कर्ष

मध्यकाल में हिन्दी भाषा ने अपने विभिन्न रूपों में अद्भुत साहित्यिक विकास किया और इसे कई महान कवियों और लेखकों का संरक्षण मिला। ब्रजभाषा, अवधी, और खड़ी बोली तीनों ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया और इसे नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।

आधुनिक काल तक आते-आते हिन्दी की स्थिति काफी बदल गई थी। ब्रजभाषा अब जनभाषा से दूर हो चुकी थी और अवधी ने बहुत पहले ही साहित्य से मुँह मोड़ लिया था। 19वीं सदी के मध्य तक अंग्रेजी सत्ता का भारत में विस्तार हो चुका था और इसका प्रभाव हिन्दी पर भी पड़ा। इस नए राजनीतिक परिदृश्य में खड़ी बोली को प्रोत्साहन मिला। जब ब्रजभाषा और अवधी जनभाषा से दूर हो गईं, तब खड़ी बोली ने उनकी जगह लेनी शुरू कर दी। अंग्रेज़ी सरकार ने भी खड़ी बोली का उपयोग आरंभ कर दिया।

आधुनिककालीन हिन्दी का विकास

प्रारंभिक संघर्ष और विकास

आधुनिक काल में खड़ी बोली को स्थापित करने में कई धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों ने सहायता की। 19वीं सदी में कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली थी। 20वीं सदी तक आते-आते खड़ी बोली गद्य और पद्य दोनों की साहित्यिक भाषा बन गई।

खड़ी बोली के प्रारंभिक रचनाकार

खड़ी बोली गद्य के प्रारंभिक रचनाकारों में सदासुख लाल ‘नियाज़’, इंशा अल्ला खां ‘इंशा’, लल्लू लालजी और सदल मिश्र प्रमुख हैं। सदासुख लाल ‘नियाज़’ ने संस्कृतमिश्रित भाषा का उपयोग किया, जबकि इंशा अल्ला खां ‘इंशा’ ने अपनी रचनाओं में उर्दू, ब्रजभाषा, अवधी और संस्कृत के शब्दों से दूर रहने का प्रयास किया। लल्लू लालजी ने ‘प्रेमसागर’ की रचना खड़ी बोली में की और सदल मिश्र ने ‘नासिकेतोपाख्यान’ को खड़ी बोली में लिखा।

भारतेन्दु-पूर्व युग

इस युग में खड़ी बोली को स्वीकृति और प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष करना पड़ा। राजा शिव प्रसाद ‘सितारे हिन्द’ ने उर्दू-ए-मुअल्ला का समर्थन किया जबकि राजा लक्ष्मण सिंह ने संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का।

भारतेन्दु युग (1850-1900)

इस युग में हिन्दी गद्य की विविध विधाओं का विकास हुआ और खड़ी बोली को गद्य साहित्य का माध्यम बनाया गया। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने खड़ी बोली में गद्य लिखा लेकिन कविता ब्रजभाषा में ही की। खड़ी बोली में कविता लिखने का आंदोलन अयोध्या प्रसाद खत्री ने चलाया।

द्विवेदी युग (1900-1920)

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादकत्व को संभालते हुए हिन्दी के परिष्कार का बीड़ा उठाया। उन्होंने खड़ी बोली को गद्य और पद्य दोनों में प्रतिष्ठित किया। इस युग में हिन्दी गद्य के कई महत्वपूर्ण लेखक सामने आए।

छायावाद युग (1918-1936) और उसके बाद

छायावाद युग में खड़ी बोली का काव्य भाषा के रूप में महत्वपूर्ण विकास हुआ। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा जैसे कवियों ने इसमें योगदान दिया। इसके बाद प्रगतिवाद और प्रयोगवाद जैसे आंदोलनों ने भी खड़ी बोली के काव्य भाषा के रूप में विकास को जारी रखा।

निष्कर्ष

आधुनिक काल में हिन्दी भाषा ने खड़ी बोली के माध्यम से गद्य और पद्य दोनों में अपार विकास किया। यह भाषा अब सिर्फ क्षेत्रीय बोली नहीं रही, बल्कि पूरे उत्तरी भारत की साहित्यिक भाषा बन गई। जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे लेखकों ने गद्य और पद्य में खड़ी बोली को स्थापित कर इसे साहित्यिक जगत में महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।

हिन्दी के विभिन्न नाम या रूप

  1. हिन्दवी/हिन्दुई/जबाने-हिन्दी/देहलवी: मध्यकाल में मध्यदेश के हिन्दुओं की भाषा, जिसमें अरबी-फारसी शब्दों का अभाव होता था। अमीर खुसरो (1253-1325) ने सबसे पहले मध्यदेश की भाषा के लिए ‘हिन्दवी’ और ‘हिन्दी’ शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने ‘खालिक बारी’ नामक एक फ़ारसी-हिन्दी कोश की रचना की, जिसमें हिन्दवी शब्द 30 बार और हिन्दी शब्द 5 बार देशी भाषा के रूप में प्रयोग हुआ है।
  2. भाषा/भाखा: विद्यापति, कबीर, तुलसीदास, केशवदास आदि ने हिन्दी के लिए ‘भाषा’ शब्द का प्रयोग किया। 19वीं सदी के प्रारंभ तक इस शब्द का प्रयोग होता रहा। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में नियुक्त हिन्दी अध्यापकों को ‘भाषा मुंशी’ कहा जाता था, जो इस बात का सूचक है।
  3. रेख्ता: मध्यकाल में मुसलमानों के बीच प्रचलित अरबी-फ़ारसी शब्दों से मिश्रित कविता की भाषा। (जैसे-मीर, ग़ालिब की रचनाएं)
  4. दक्खिनी/दक्कनी: मध्यकाल में दक्कन के मुसलमानों द्वारा फ़ारसी लिपि में लिखी जानेवाली भाषा। हिन्दी में गद्य रचना परंपरा की शुरूआत दक्कनी हिन्दी के रचनाकारों से हुई। दक्कनी हिन्दी को उत्तरी भारत में लोकप्रिय बनाने का श्रेय प्रसिद्ध शायर वली दक्कनी (1667-1707) को जाता है।
  5. खड़ी बोली: खड़ी बोली की तीन शैलियाँ होती हैं:
    • हिन्दी/शुद्ध हिन्दी/उच्च हिन्दी/नागरी हिन्दी/आर्यभाषा: नागरी लिपि में लिखित संस्कृत बहुल खड़ी बोली (जैसे-जयशंकर प्रसाद की रचनाएं)
    • उर्दू/जबाने-उर्दू/जबाने-उर्दू-मुअल्ला: फ़ारसी लिपि में लिखित अरबी-फारसी बहुल खड़ी बोली (जैसे-मण्टो की रचनाएँ)
    • हिन्दुस्तानी: हिन्दी-उर्दू का मिश्रित रूप, आम जन द्वारा प्रयुक्त (जैसे – प्रेमचंद की रचनाएं)

नोट: 13वीं सदी से 18वीं सदी तक हिन्दी-उर्दू में कोई मौलिक भेद नहीं था।

हिन्दी के विभिन्न अर्थ

  1. भाषा शास्त्रीय अर्थ: नागरी लिपि में लिखित संस्कृतबहुल खड़ी बोली।
  2. संवैधानिक/वैधानिक/कानूनी अर्थ: संविधान के अनुसार, हिन्दी भारत संघ की राजभाषा या अधिकृत भाषा तथा अनेक राज्यों की राजभाषा है।
  3. सामान्य अर्थ: समस्त हिन्दी भाषी क्षेत्र की परिनिष्ठित भाषा अर्थात् शासन, शिक्षा, साहित्य, व्यापार आदि की भाषा।
  4. व्यापक अर्थ: आधुनिक युग में हिन्दी को केवल खड़ी बोली में सीमित नहीं किया जा सकता। हिन्दी की सभी उपभाषाएँ और बोलियाँ हिन्दी के व्यापक अर्थ में आ जाती हैं।

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