प्राचीन भारतीय अभिलेख और उनके शासक: एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण

प्राचीन भारतीय अभिलेख और उनके शासक: एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण

विदेशी यात्रियों से मिलने वाली प्रमुख जानकारी

A. यूनानी-रोमन लेखक

  1. टेसियस : यह ईरान का राजवैद्य था। इसके भारत संबंधी विवरण आश्चर्यजनक कहानियों से भरे होने के कारण अविश्वसनीय माने जाते हैं।
  2. हेरोडोटस : इसे ‘इतिहास का पिता’ कहा जाता है। इसने अपनी पुस्तक ‘हिस्टोरिका’ में 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के भारत-फारस (ईरान) संबंध का वर्णन किया है। हालांकि, इसका विवरण भी अनुश्रुतियों और अफवाहों पर आधारित है।
  3. सिकंदर के साथ आने वाले लेखक : निर्याकस, आनेसिक्रटस, और आरिस्टोबुलस के विवरण अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय माने जाते हैं।
  4. मेगास्थनीज : यह सेल्युकस निकेटर का राजदूत था, जो चंद्रगुप्त मौर्य के राजदरबार में आया था। इसने अपनी पुस्तक ‘इण्डिका’ में मौर्य युगीन समाज और संस्कृति के बारे में लिखा है।
  5. डाइमेकस : यह सीरियन नरेश आन्तियोकस का राजदूत था, जो बिंदुसार के राजदरबार में आया था। इसका विवरण भी मौर्य-युग से संबंधित है।
  6. डायोनिसियस : यह मिस्र नरेश टॉलमी फिलेडेल्फस का राजदूत था, जो अशोक के राजदरबार में आया था।
  7. टॉलमी : इसने दूसरी शताब्दी में ‘भारत का भूगोल’ नामक पुस्तक लिखी।
  8. प्लिनी : इसने प्रथम शताब्दी में ‘नेचुरल हिस्ट्री’ नामक पुस्तक लिखी। इसमें भारतीय पशुओं, पेड़-पौधों, खनिज पदार्थों आदि के बारे में विवरण मिलता है।
  9. पेरीप्लस ऑफ द एरिथ्रियन-सी : इस पुस्तक के लेखक के बारे में जानकारी नहीं है। यह लेखक करीब 80 ई. में हिन्द महासागर की यात्रा पर आया था। इसने उस समय के भारत के बंदरगाहों और व्यापारिक वस्तुओं के बारे में जानकारी दी है।

चीनी लेखक

  1. फाहियान : यह चीनी यात्री गुप्त नरेश चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में आया था। इसने अपने विवरण में मध्यप्रदेश के समाज एवं संस्कृति के बारे में वर्णन किया है और यहाँ की जनता को सुखी एवं समृद्ध बताया है। यह 14 वर्षों तक भारत में रहा।
  2. संयुगन : यह 518 ई. में भारत आया। इसने अपने तीन वर्षों की यात्रा में बौद्ध धर्म की प्राप्तियाँ एकत्रित कीं।
  3. ह्वेनसांग : यह हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था। ह्वेनसांग 629 ई. में चीन से भारत के लिए प्रस्थान किया और लगभग एक वर्ष की यात्रा के बाद भारतीय राज्य कपिशा पहुँचा। यह भारत में 15 वर्षों तक रहा और 645 ई. में चीन लौट गया। वह नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन करने तथा भारत से बौद्ध ग्रंथों को एकत्र कर ले जाने के लिए आया था। इसका भ्रमण वृत्तांत सि-यू-की नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें 138 देशों का विवरण मिलता है। इसने हर्षकालीन समाज, धर्म तथा राजनीति का वर्णन किया है। इसके अनुसार, सिन्ध का राजा शूद्र था और इसने बुद्ध की प्रतिमा के साथ-साथ सूर्य और शिव की प्रतिमाओं का भी पूजन किया था। नोट: ह्वेनसांग के अध्ययन के समय नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे। यह विश्वविद्यालय बौद्ध दर्शन के लिए प्रसिद्ध था।
  4. इत्सिंग : यह 7वीं शताब्दी के अन्त में भारत आया। इसने अपने विवरण में नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा अपने समय के भारत का वर्णन किया है।

अरबी लेखक

  1. अलबरुनी : यह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। अलबरुनी ख्वारिज़्म या खीव (आधुनिक तुर्कमेनिस्तान) का रहने वाला था। अरबी में लिखी गई उसकी कृति ‘किताब-उल-हिन्द’ या ‘तहकीक-ए-हिन्द (भारत की खोज)’, आज भी इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह विस्तृत ग्रंथ अस्सी अध्यायों में विभाजित है, जिसमें धर्म और दर्शन, त्योहारों, खगोल विज्ञान, कीमिया, रीति-रिवाजों, सामाजिक जीवन, भार-तौल तथा मापन विधियों, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान आदि विषयों पर चर्चा की गई है। इसमें राजपूत-कालीन समाज, धर्म, रीति-रिवाज, और राजनीति पर सुन्दर प्रकाश डाला गया है।
  2. इब्न बतूता : इसका यात्रा-वृतांत जिसे ‘रेहला’ कहा जाता है, 14वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के बारे में बहुत ही प्रचुर तथा रोचक जानकारियाँ देता है। 1333 ई. में दिल्ली पहुँचने पर इसकी विद्वता से प्रभावित होकर सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने उसे दिल्ली का काजी या न्यायाधीश नियुक्त किया।

पुरातत्व संबंधी साक्ष्य से मिलने वाली जानकारी

भारतीय पुरातत्वशास्त्र के पितामह सर एलेक्जेंडर कनिंघम को कहा जाता है।

  • 1400 ई.पू. के अभिलेख ‘बोगाज-कोई’ (एशिया माइनर) : इसमें वैदिक देवता मित्र, वरुण, इन्द्र और नासत्य (अश्विनी कुमार) के नाम मिलते हैं।
  • मध्य भारत में भागवत धर्म : इसका प्रमाण यवन राजदूत ‘होलियोडोरस’ के वेसनगर (विदिशा) गरुड़ स्तम्भ लेख से प्राप्त होता है।
  • भारतवर्ष का जिक्र : सर्वप्रथम हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है।
  • सर्वप्रथम दुर्भिक्ष की जानकारी : सौहगौरा अभिलेख से मिलती है, जिसमें संकट काल में उपयोग हेतु खाद्यान्न सुरक्षित रखने का उल्लेख है।
  • भारत पर हूण आक्रमण : सर्वप्रथम भीतरी स्तंभ लेख से जानकारी मिलती है।
  • सती-प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य : एरण अभिलेख (शासक भानुगुप्त) से मिलता है।
  • सातवाहन राजाओं का इतिहास : उनके अभिलेखों के आधार पर लिखा गया है।
  • रेशम बुनकर की श्रेणियों की जानकारी : मंदसौर अभिलेख से मिलती है।
  • कश्मीरी नवपाषाणिक पुरास्थल बुर्जहोम : यहाँ से गर्तावास (गड्डा घर) का साक्ष्य मिला है। इनमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं और मनुष्य के साथ उसके पालतू कुत्ते को भी दफनाने की प्रथा थी।
  • प्राचीनतम सिक्के : आहत सिक्के कहलाते हैं, जिन्हें साहित्य में काषार्पण कहा गया है।
  • सर्वप्रथम सिक्कों पर लेख : यवन शासकों ने लिखना शुरू किया।

महत्वपूर्ण अभिलेख और शासक

अभिलेख का नामशासक
हाथीगुम्फा अभिलेखकलिंग राज खारवेल
जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेखरुद्रदामन
नासिक अभिलेखगौतमी बलश्री
प्रयाग स्तम्भ लेखसमुद्रगुप्त
ऐहोल अभिलेखपुलकेशिन-II
मन्दसौर अभिलेखमालवा नरेश यशोवर्मन
ग्वालियर अभिलेखप्रतिहार नरेश भोज
भितरी एवं जूनागढ़ अभिलेखस्कन्दगुप्त
देवपाड़ा अभिलेखबंगाल शासक विजयसेन

अन्य महत्वपूर्ण जानकारी

  • एपीग्राफी : अभिलेखों के अध्ययन को कहा जाता है।
  • समुद्रगुप्त की वीणा बजाती हुई मुद्रा वाले सिक्के : इससे उसके संगीत प्रेमी होने का प्रमाण मिलता है।
  • अरिकमेडू (पुदुचेरी के निकट) : यहाँ से रोमन सिक्के प्राप्त हुए हैं।
  • भारत के संबंध : बर्मा (सुवर्णभूमि – वर्तमान म्यांमार), मलाया (स्वर्णद्वीप), कंबोडिया (कंबोज), और जावा (यवद्वीप) से सबसे पहले स्थापित हुए।

मंदिर निर्माण की शैलियाँ

  • उत्तर भारत के मंदिरों की शैली : नागर शैली
  • दक्षिण भारत के मंदिरों की शैली : द्राविड़ शैली
  • दक्षिणापथ के मंदिरों की शैली : वेसर शैली (नागर और द्राविड़ शैलियों का सम्मिश्रण)
  • पंचायतन मंदिर : मुख्य मंदिर चार सहायक मंदिरों से घिरा होता है। उदाहरण – कंदरिया महादेव मंदिर (खजुराहो), ब्रह्मेश्वर मंदिर (भुवनेश्वर), लक्ष्मण मंदिर (खजुराहो), लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर), दशावतार मंदिर (देवगढ़, उ.प्र.), गोंडेश्वर मंदिर (महाराष्ट्र)

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