उत्तराखंड शासन-प्रशासन: इतिहास, संरचना और महत्वपूर्ण तथ्य

उत्तराखंड शासन-प्रशासन: इतिहास, संरचना और महत्वपूर्ण तथ्य

शासन-प्रशासन

देश के अन्य राज्यों की तरह, इस राज्य का शासन-प्रशासन भी भारतीय संविधान के अध्याय 6 (अनुच्छेद 152 से 237 तक) के अनुसार संचालित होता है। संविधान के अनुसार, राज्य में संसदीय प्रणाली लागू है, जिसके तीन प्रमुख अंग हैं:

  1. कार्यपालिका (राज्यपाल, मंत्रीपरिषद, सचिवालय, विभाग तथा महाधिवक्ता)
  2. विधान मंडल (राज्यपाल एवं विधानसभा)
  3. न्यायपालिका (उच्च तथा अधीनस्थ न्यायालय)

कार्यपालिका

राज्यपाल

संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्याध्यक्ष होता है जिसे राज्यपाल कहा जाता है। राज्यपाल राज्य सरकार का प्रमुख होता है और राज्य की कार्यपालिका शक्ति उसी में निहित होती है। वह अपने अधीनस्थों के माध्यम से इस शक्ति का प्रयोग करता है और संवैधानिक प्रमुख होता है। राज्यपाल राज्य के विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति और प्रथम नागरिक भी होता है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा पांच वर्षों के लिए की जाती है और राष्ट्रपति उसे जब चाहे पद से हटा सकता है।

मंत्रिपरिषद

संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार, राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और उसकी सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। इसके बाद, उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है। मंत्रीगण राज्यपाल की प्रसन्नता तक पद पर बने रहते हैं। राज्य मंत्रिपरिषद प्रशासनिक, विधायी और वित्तीय कार्यों का संचालन करती है। यह राज्य की वास्तविक कार्यपालिका होती है और शासन की धुरी होती है। यह एक नीति-निर्णायक निकाय है जो कार्यपालिका और व्यवस्थापिका को जोड़ने का कार्य करती है।

मुख्यमंत्री

राज्य कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान मुख्यमंत्री होता है। वह राज्य शासन का प्रमुख होता है और मंत्रीमंडल में उसकी विशेष स्थिति होती है। मुख्यमंत्री के कार्य और दायित्व प्रधानमंत्री के समान होते हैं।

सचिवालय

राज्य के कार्यपालिका अंग, यानी मंत्रीपरिषद, के सदस्य जनप्रतिनिधि होते हैं और वे प्रशासन की जटिलताओं से अवगत नहीं होते। इसलिए, प्रशासनिक सहायता और परामर्श के लिए मुख्य सचिव के नेतृत्व में एक प्रशासनिक निकाय का गठन किया गया है जिसे राज्य सचिवालय कहा जाता है। सचिवालय के प्रशासनिक प्रमुख को मुख्य सचिव कहा जाता है और प्रत्येक विभाग के सचिव को ‘शासन सचिव’ कहा जाता है। वे आमतौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वरिष्ठ और अनुभवी सदस्य होते हैं।

उत्तराखंड का प्रशासनिक इतिहास

उत्तराखंड में अंग्रेजी शासन के आरंभिक दौर में प्रशासनिक संरचना में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए। यहाँ इस क्षेत्र के प्रशासनिक विकास का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:

  1. गढ़वाल और कुमाऊँ पर कब्जा:
  • 1814 में गढ़वाल और 1815 में कुमाऊँ पर अंग्रेजों का कब्जा हुआ। कुमाऊँ जनपद का गठन किया गया और गढ़वाल नरेश से लिए गए क्षेत्र को कुमाऊँ का एक परगना बनाया गया।
  • देहरादून-चकराता क्षेत्रों को पहले सहारनपुर, फिर कुमाऊँ में शामिल किया गया।
  1. दून जिले का गठन:
  • 1871 में दून को एक जिले के रूप में गठित कर मेरठ मंडल में शामिल कर लिया गया।
  1. ब्रिटिश गढ़वाल का मुख्यालय:
  • 1840 में ब्रिटिश गढ़वाल का मुख्यालय श्रीनगर से पौड़ी लाया गया और पौड़ी गढ़वाल जिले का गठन किया गया।
  1. कुमाऊँ मंडल का गठन:
  • 1854 में कुमाऊँ मंडल का गठन कर नैनीताल को मुख्यालय बनाया गया। 1890 तक कुमाऊँ कमिश्नरी में केवल दो जिले (कुमाऊँ और पौड़ी गढ़वाल) रहे।
  • 1891 में कुमाऊँ जिले को अल्मोड़ा और नैनीताल जिलों में विभाजित कर दिया गया।
  1. स्वतंत्रता के बाद:
  • स्वतंत्रता के बाद 1 अगस्त 1949 तक कुमाऊँ मंडल में केवल तीन जिले (पौड़ी, अल्मोड़ा, और नैनीताल) और एक रियासत (टिहरी) शामिल थे।
  • 1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत को कुमाऊँ मंडल का चौथा जिला बनाकर टिहरी गढ़वाल नाम दिया गया।
  1. नए जिलों का गठन:
  • 1960 में टिहरी जिले से उत्तरकाशी, पौड़ी जिले से चमोली और अल्मोड़ा जिले से पिथौरागढ़ जिले का गठन किया गया।
  • 1969 में गढ़वाल मंडल गठित कर पौड़ी में मंडल मुख्यालय बनाया गया। टिहरी, पौड़ी, चमोली, और उत्तरकाशी को कुमाऊँ मंडल से निकालकर इसके अधीन रखा गया जबकि नैनीताल, अल्मोड़ा, और पिथौरागढ़ को कुमाऊँ मंडल में ही रखा गया।
  • 1975 में देहरादून को मेरठ मंडल से हटाकर गढ़वाल मंडल में सम्मिलित किया गया।
  • 28 दिसंबर 1988 को हरिद्वार जिले का गठन किया गया। राज्य गठन के बाद इसे सहारनपुर मंडल से हटाकर गढ़वाल मंडल में शामिल किया गया।
  • 30 सितंबर 1995 को ऊधमसिंह नगर जिले का गठन किया गया।
  • 15 सितंबर 1997 को चम्पावत और बागेश्वर जिले का गठन किया गया।
  • 16 सितंबर 1997 को रुद्रप्रयाग जिले का गठन किया गया।

इस प्रकार, उत्तराखंड की प्रशासनिक संरचना समय-समय पर बदलती रही है और आज यह राज्य कई जिलों में विभाजित है, जिनकी स्थापना विभिन्न ऐतिहासिक घटनाओं और प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार की गई है।

सचिवालय और राज्य प्रशासन

सचिवालय

सचिवालय राज्य प्रशासन का पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करता है। सरकारी नीतियों के निर्माण के लिए आवश्यक सामग्री एकत्रित करना और उसका विश्लेषण कर मंत्री परिषद के सामने प्रस्तुत करना सचिवालय का मुख्य कर्तव्य है।

मुख्य सचिव

राज्य प्रशासन में मुख्य सचिव का पद सबसे महत्वपूर्ण होता है। राज्य में जो भूमिका और कार्य मुख्य सचिव का होता है, वही केंद्र में कैबिनेट सचिव का होता है। मुख्य सचिव राज्य प्रशासन का धुरी होता है।

कार्यकारी विभाग (निदेशालय)

राज्य प्रशासन में तीन मुख्य अवयव होते हैं: मंत्री परिषद (राजनीतिक प्रमुख), सचिवालय (प्रशासनिक प्रमुख), और कार्यकारी विभाग (निदेशालय)। पहले दो अवयव नीति निर्माण से संबंधित होते हैं, जबकि निदेशालय क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार होता है।

राजस्व पुलिस

पृष्ठभूमि

1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज उत्तराखंड के सभी क्षेत्रों में सिविल पुलिस व्यवस्था लागू करना चाहते थे। लेकिन कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर रैम्जे (1856-84) ने राज्य की जनता को सीधा-साधा बताते हुए राजस्व पुलिस व्यवस्था को बनाए रखने की सिफारिश की थी।

व्यवस्था

1874 से राज्य में राजस्व पुलिस व्यवस्था लागू है और यह वर्तमान में राज्य के लगभग 61% हिस्से में लागू है। इस व्यवस्था में पटवारी, कानूनगो, नायब तहसीलदार, तहसीलदार, परगनाधिकारी, जिलाधिकारी और कमिश्नर आदि को राजस्व के साथ ही पुलिस का काम भी करना पड़ता है। इनका काम अपराधों की जांच करना, मुकदमा दर्ज करना और अपराधियों को पकड़ना होता है। हालांकि, हाल के समय में राजस्व क्षेत्रों को सिविल पुलिस के हवाले करने की मांग उठी है क्योंकि राजस्व पुलिस के पास अपराध रोकने की पुख्ता व्यवस्था और तकनीकी जानकारी का अभाव है।

अंग्रेजी शासनकाल

अंग्रेजी शासनकाल में कुमाऊँ में 19 परगनें और 125 पट्टियां (पटवारी क्षेत्र) थे, जबकि गढ़वाल में 11 परगनें और 86 पट्टियां थीं।

प्रशासनिक ढांचा

सचिवालय और विभाग

एक शासन सचिव के अधीन कई विभाग होते हैं। उदाहरण के लिए, गृह सचिव के अधीन पुलिस, जेल, आंतरिक सुरक्षा आदि विभाग आते हैं। विभिन्न विभागों की कार्यात्मक इकाइयां नीचे तक फैली होती हैं और सबके अपने विभाजन स्तर होते हैं।

मण्डलायुक्त और जिलाधिकारी

सामान्य और राजस्व प्रशासन में विभागाध्यक्ष के बाद मंडलायुक्त होता है, जो अपने मंडल के शांति-व्यवस्था, राजस्व वसूली और अन्य कार्यों को देखता है। वर्तमान में राज्य में दो मंडल (गढ़वाल और कुमाऊँ) हैं। गढ़वाल मंडल में सबसे अधिक 7 जिले हैं। मंडल के नीचे जिलाधिकारी के नेतृत्व में जिले होते हैं। राज्य में कुल 13 जिले हैं।

तहसील और विकास प्रशासन

जिले से नीचे उप-जिलाधिकारी के नेतृत्व में तहसीलें होती हैं। राज्य गठन के समय प्रदेश में कुल 49 तहसीलें थीं। विकास प्रशासन में भी राज्य स्तर, जिला स्तर और ब्लाक स्तर होता है।

महाधिवक्ता

संविधान के अनुच्छेद 165 के अनुसार राज्य में महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। इस पद पर नियुक्ति के लिए आवश्यक है कि वह भारत का नागरिक हो और 10 वर्ष से अधिक समय से न्यायिक कार्य से जुड़ा हो या कम से कम 10 वर्ष से उच्च न्यायालय में अधिवक्ता का कार्य किया हो। महाधिवक्ता विधि विषयों पर राज्यपाल को सलाह देता है और राज्यपाल द्वारा सौंपे गए विधि संबंधी कार्यों का संपादन करता है। वह सदनों की बैठकों में भाग ले सकता है और बोल सकता है, लेकिन मतदान नहीं कर सकता।

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